लहरों से कदम मिलते ही,हम लहरों मे मिल जाते है
चलते मुसाफिरो की धून मे ,हम भी मुसाफिर बन जाते है
कुछ पाकर के कुछ खोते है ,कुछ लफ्जों मे दोहराते है
कुछ लेकर के इस जहां से , हम भी राहगीर बन जाते है
जन्म मरण की भूमि पर , हम शब्दों मे बतलाते है
की रोम रोम मे गंगा जैसे ह्रदय मे संगम बनता है
कंठ मे वो ताल की जैसे , सरस्वती कुंड ही बहता है
चमक चाँद की चांदनी, चंचल सुर से कुछ ताल है
चलते रसिकों के तन पर जैसे , अभिराम का वास है
अल्लाह , ईश्वर नाम पुकारे, हम जिनकी संतान है
और
सनातनो की भूमि पर जैसे , हम तो अभी विराम है
होकर पथिको से , अभिप्रेरित हमने भी बाण उठाया था
जन्मभूमि से कर्मभूमि तक हमने भी वक्त लगाया था
मनोभूमि की रचना जैसे
रणभूमि मे आते है
और रणभूमि से पहले मनोभूमि मे बाण चलते है
तन , मन, रण के इस प्रष्ठ पर , हम भी करके दिखलाते है
//पूजा;